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mahabharat 6.107.65-66h: हे महाबाहु! आप युद्ध में सदैव गोलाकार धनुष लिए हुए दिखाई देते हैं। दूसरे सूर्य के समान रथ पर विराजमान होकर आप कब बाण हाथ में लेते हैं, कब उसे धनुष पर चढ़ाते हैं और कब उसकी प्रत्यंचा खींचते हैं, यह हम नहीं देख पाते।   |   mahabharat अध्याय 6.107: नवें दिनके युद्धकी समाप्ति, रातमें पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंका भीष्मसे मिलकर उनके वधका उपाय जानना   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 107: नवें दिनके युद्धकी समाप्ति, रातमें पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंका भीष्मसे मिलकर उनके वधका उपाय जानना  »  श्लोक 65-66h
 
 
श्लोक  6.107.65-66h 
मण्डलेनैव धनुषा दृश्यसे संयुगे सदा।
आददानं संदधानं विकर्षन्तं धनुर्न च॥ ६५॥
पश्यामस्त्वां महाबाहो रथे सूर्यमिवापरम्।
 
 
अनुवाद
हे महाबाहु! आप युद्ध में सदैव गोलाकार धनुष लिए हुए दिखाई देते हैं। दूसरे सूर्य के समान रथ पर विराजमान होकर आप कब बाण हाथ में लेते हैं, कब उसे धनुष पर चढ़ाते हैं और कब उसकी प्रत्यंचा खींचते हैं, यह हम नहीं देख पाते।
 
‘You are always seen in battle with a circular bow. O mighty-armed one! Sitting on the chariot like another Sun, we cannot see when you take the arrow in your hand, when you place it on the bow and when you pull its string. 65 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)