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mahabharat 6.106.70-71: उस समय श्रीकृष्ण के नेत्र क्रोध से भरे हुए थे और वे फुंफकारते हुए सर्प के समान भारी साँस ले रहे थे। उनके मित्र अर्जुन ने व्यथित स्वर में प्रेमपूर्वक कहा - 'महाबाहु! लौट आओ, अपनी प्रतिज्ञा झूठी मत करो।' 70-71।   |   mahabharat अध्याय 6.106: भीष्मके द्वारा पराजित पाण्डवसेनाका पलायन और भीष्मको मारनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको अर्जुनका रोकना   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 106: भीष्मके द्वारा पराजित पाण्डवसेनाका पलायन और भीष्मको मारनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको अर्जुनका रोकना  »  श्लोक 70-71
 
 
श्लोक  6.106.70-71 
तत एवमुवाचार्त: क्रोधपर्याकुलेक्षणम्॥ ७०॥
नि:श्वसन्तं यथा नागमर्जुन: प्रणयात् सखा।
निवर्तस्व महाबाहो नानृतं कर्तुमर्हसि॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
उस समय श्रीकृष्ण के नेत्र क्रोध से भरे हुए थे और वे फुंफकारते हुए सर्प के समान भारी साँस ले रहे थे। उनके मित्र अर्जुन ने व्यथित स्वर में प्रेमपूर्वक कहा - 'महाबाहु! लौट आओ, अपनी प्रतिज्ञा झूठी मत करो।' 70-71।
 
At that time Shri Krishna's eyes were filled with anger and he was breathing heavily like a hissing snake. His friend Arjuna said lovingly in a distressed tone - 'Mahabahu! Come back, do not make your promise false. 70-71.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)