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श्लोक 6.103.47  |
एतस्मात् कारणाद् घोरो वर्तते स्वजनक्षय:।
दैवाद् वा पुरुषव्याघ्र तव चापनयान्नृप॥ ४७॥ |
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| अनुवाद |
| पुरुषसिंह! हे मनुष्यों के स्वामी! इसी कारण से, चाहे दैवी प्रेरणा से या आपके अपने अन्याय के कारण, इस युद्ध में स्वजनों का भयंकर संहार हो रहा है ॥47॥ |
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| Purushsingh! O Lord of men! Due to this reason, either due to the divine inspiration or due to your own injustice, in this war, there is a terrible massacre of relatives. ॥ 47॥ |
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे त्र्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १०३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें घमासान युद्धविषयक एक सौ तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥ १०३॥
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