श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 103: उभय पक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध और रक्तमयी रणनदीका वर्णन  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  6.103.25-26 
चर्मभिश्चामरैश्चित्रै: पताकाभिश्च मारिष।
छत्रै: सितैर्हेमदण्डैश्चामरैश्च समन्तत:॥ २५॥
विशीर्णैर्विप्रधावन्तो दृश्यन्ते स्म दिशो दश।
नवमेघप्रतीकाशा जलदोपमनि:स्वना:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
माननीय महाराज! ढालें, विचित्र पंखे, पताकाएँ, श्वेत छत्र, सुवर्णमय दण्ड और चमर (पंखे) सब ओर बिखरे हुए थे और (उनके ऊपर) नवीन मेघों के समान हाथी, मेघों के समान भयंकर गर्जना करते हुए सब दिशाओं में दौड़ते हुए दिखाई दे रहे थे॥25-26॥
 
Honorable Maharaj! Shields, strange fans, banners, white umbrellas, golden staffs and chamaras (fans) were scattered all around and (above them) elephants, like clouds of new clouds, were seen running in all directions roaring terribly like the clouds.॥25-26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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