श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 102: द्रोणाचार्य और सुशर्माके साथ अर्जुनका युद्ध तथा भीमसेनके द्वारा गजसेनाका संहार  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  6.102.4 
संजय उवाच
न द्रोण: समरे पार्थं जानीते प्रियमात्मन:।
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य पार्थो वा गुरुमाहवे॥ ४॥
 
 
अनुवाद
संजय ने कहा - महाराज! द्रोणाचार्य युद्धस्थल में अर्जुन को अपना प्रिय नहीं मानते और अर्जुन भी क्षत्रिय धर्म को सर्वोपरि रखते हुए युद्धस्थल में अपने गुरु को अपना प्रिय नहीं मानते।॥4॥
 
Sanjaya said - Maharaj! Dronacharya does not consider Arjuna as his favourite in the battlefield and Arjuna too, keeping the kshatriya dharma in the forefront, does not consider his Guru as his favourite in the battlefield. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)