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mahabharat 6.102.34-35h: हाथियों के दांतों से बार-बार बिंधे हुए भीमसेन युद्धभूमि के मुहाने पर खिले हुए अशोक वृक्ष के समान शोभा पा रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 6.102: द्रोणाचार्य और सुशर्माके साथ अर्जुनका युद्ध तथा भीमसेनके द्वारा गजसेनाका संहार   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  6.102.34-35h 
बहुधा दारितश्चैव विषाणैस्तत्र दन्तिभि:॥ ३४॥
फुल्लाशोकनिभ: पार्थ: शुशुभे रणमूर्धनि।
 
 
अनुवाद
हाथियों के दांतों से बार-बार बिंधे हुए भीमसेन युद्धभूमि के मुहाने पर खिले हुए अशोक वृक्ष के समान शोभा पा रहे थे।
 
Bhimasena, pierced many times by the elephants' teeth, looked as beautiful as the blooming Ashoka tree at the mouth of the battle field. 34 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)