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mahabharat 6.101.49: वह बाण सात्यकि को छेदकर पृथ्वी में उसी प्रकार समा गया, जैसे वसन्त ऋतु में एक बलवान शिशु सर्प अपने बिल में समा जाता है।   |   mahabharat अध्याय 6.101: अभिमन्युके द्वारा अलम्बुषकी पराजय, अर्जुनके साथ भीष्मका तथा कृपाचार्य, अश्वत्थामा और द्रोणाचार्यके साथ सात्यकिका युद्ध   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 101: अभिमन्युके द्वारा अलम्बुषकी पराजय, अर्जुनके साथ भीष्मका तथा कृपाचार्य, अश्वत्थामा और द्रोणाचार्यके साथ सात्यकिका युद्ध  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  6.101.49 
शैनेयं स तु निर्भिद्य प्राविशद् धरणीतलम्।
वसन्तकाले बलवान् बिलं सर्पशिशुर्यथा॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
वह बाण सात्यकि को छेदकर पृथ्वी में उसी प्रकार समा गया, जैसे वसन्त ऋतु में एक बलवान शिशु सर्प अपने बिल में समा जाता है।
 
That arrow, having pierced Satyaki, entered the earth just like a strong baby snake enters its burrow during the spring season.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)