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mahabharat 6.101.17-18h: उन सुवर्णमय पंखों वाले बाणों को अपने अंगों में धारण किए हुए महादैत्य अलम्बुष अग्नि की लपटों से आवृत पर्वत के समान शोभा पा रहा था ॥17 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 6.101: अभिमन्युके द्वारा अलम्बुषकी पराजय, अर्जुनके साथ भीष्मका तथा कृपाचार्य, अश्वत्थामा और द्रोणाचार्यके साथ सात्यकिका युद्ध   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 101: अभिमन्युके द्वारा अलम्बुषकी पराजय, अर्जुनके साथ भीष्मका तथा कृपाचार्य, अश्वत्थामा और द्रोणाचार्यके साथ सात्यकिका युद्ध  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  6.101.17-18h 
संधारयाणश्च शरान् हेमपुङ्खान् महाबल:॥ १७॥
विबभौ राक्षसश्रेष्ठ: सज्वाल इव पर्वत:।
 
 
अनुवाद
उन सुवर्णमय पंखों वाले बाणों को अपने अंगों में धारण किए हुए महादैत्य अलम्बुष अग्नि की लपटों से आवृत पर्वत के समान शोभा पा रहा था ॥17 1/2॥
 
Holding those arrows with golden wings in his limbs, the great demon Alambush was looking beautiful like a mountain covered with flames of fire. 17 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)