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श्लोक 6.10.15  |
संक्षेपो वर्तते राजन् द्वापरेऽस्मिन् नराधिप।
गुणोत्तरं हैमवतं हरिवर्षं तत: परम्॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| हे मनुष्यों के स्वामी! इस द्वापर में भी गुणों का अभाव है। भारतवर्ष की अपेक्षा हेमवत् और हरिवर्ष में क्रमशः अधिक गुण हैं।॥15॥ |
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| Lord of men! Even in this Dwapar there is a dearth of virtues. In comparison to Bharatvarsh, Heimavat and Harivarsh have progressively more virtues. ॥ 15॥ |
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वणि भारतवर्षे कृताद्यनुरोधेनायुर्निरूपणे दशमोऽध्याय:॥ १०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत जम्बूखण्डविनिर्माणपर्वमें भारतवर्षमें सत्ययुग आदिके अनुसार आयुका निरूपणविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०॥
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