भवतां च कुरुश्रेष्ठ कुलं बहुमतं भुवि।
तत् तथैवास्तु भद्रं ते स्वार्थमेवोपचिन्तय॥ ५२॥
अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ! इस पृथ्वी पर तुम्हारा कुल अत्यन्त प्रतिष्ठित है। वह इसी प्रकार प्रतिष्ठित रहे और तुम समृद्ध हो जाओ, केवल अपने वास्तविक स्वार्थ का ही चिन्तन करो ॥ 52॥
O best of the Kurus! Your clan is very prestigious on this earth. May it remain respected in the same way and may you prosper, think of your real self-interest only. ॥ 52॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि दम्भोद्भवोपाख्याने षण्णवतितमोऽध्याय:॥ ९६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें दम्भोद्भवका कथाविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९६॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५३ श्लोक हैं।]
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥