श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 96: परशुरामजीका दम्भोद्भवकी कथाद्वारा नर-नारायणस्वरूप अर्जुन और श्रीकृष्णका महत्त्व वर्णन करना  »  श्लोक 25-d2
 
 
श्लोक  5.96.25-d2 
ततो नरस्त्विषीकाणां मुष्टिमादाय भारत॥ २५॥
अब्रवीदेहि युद्धॺस्व युद्धकामुक क्षत्रिय।
सर्वशस्त्राणि चादत्स्व योजयस्व च वाहिनीम्॥ २६॥
(संनह्यस्व च वर्माणि यानि चान्यानि सन्ति ते।)
अहं हि ते विनेष्यामि युद्धश्रद्धामित: परम्।
(यदाह्वयसि दर्पेण ब्राह्मणप्रमुखाञ्जनान्॥ )
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! तब उस महापुरुष ने मुट्ठी भर भाले हाथ में लेकर कहा- 'युद्ध की इच्छा रखने वाले क्षत्रिय! आओ, युद्ध करो। अपने सब अस्त्र-शस्त्र लेकर जाओ। सारी सेना तैयार करो, कवच पहनो और जो भी साधन तुम्हारे पास हों, उनसे सुसज्जित हो जाओ। तुम बड़े अभिमानी हो और ब्राह्मणों सहित सब जातियों के लोगों को ललकारते रहते हो; इसीलिए आज से मैं तुम्हारे युद्ध करने के निश्चय को हर लेता हूँ।'॥ 25-26॥
 
Bharatanandan! Then the great man took a handful of spears in his hand and said- 'Kshatriya who wants war! Come, fight. Take all your weapons. Prepare the whole army, wear armour, and equip yourself with all the other resources you have. You are very proud and keep challenging people of all castes including Brahmins; that is why from today I am taking away your determination to fight.'॥ 25-26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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