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श्लोक 5.96.24-25h  |
राम उवाच
उच्यमानस्तथापि स्म भूय एवाभ्यभाषत।
पुन: पुन: क्षम्यमाण: सान्त्व्यमानश्च भारत॥ २४॥
दम्भोद्भवो युद्धमिच्छन्नाह्वयत्येव तापसौ। |
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| अनुवाद |
| परशुरामजी कहते हैं- हे भारत! उन दोनों महात्माओं ने बार-बार ऐसा कहा और राजा से क्षमा मांगी तथा उन्हें अनेक प्रकार से सान्त्वना दी। किन्तु युद्ध की इच्छा से दम्भोद्भव उन दोनों तापसों को बार-बार बुलाता और ललकारता रहा। 24 1/2॥ |
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| Parshuramji says- India! Those two Mahatmas repeatedly said this and asked for forgiveness from the king and consoled him in various ways. However, with the desire for war, Dambhodbhava kept calling and challenging those two tapasyas. 24 1/2॥ |
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