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श्लोक 5.96.22-23  |
नरनारायणावूचतु:
अपेतक्रोधलोभोऽयमाश्रमो राजसत्तम॥ २२॥
न ह्यस्मिन्नाश्रमे युद्धं कुत: शस्त्रं कुतोऽनृजु:।
अन्यत्र युद्धमाकाङ्क्ष बहव: क्षत्रिया: क्षितौ॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| नर-नारायण बोले- हे राजनश्रेष्ठ! हमारा आश्रम क्रोध और लोभ से रहित है। इस आश्रम में युद्ध नहीं होता, फिर शस्त्रधारी और कुटिल वृत्ति वाला मनुष्य यहाँ कैसे रह सकता है? इस पृथ्वी पर क्षत्रिय बहुत हैं, अतः आप अन्यत्र जाकर अपनी युद्ध की इच्छा पूरी करें।॥ 22-23॥ |
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| Nara-Narayana said— O best of kings! Our hermitage is free from anger and greed. There is no war in this hermitage, then how can a man with weapons and a crooked attitude live here? There are many Kshatriyas on this earth, hence you should go somewhere else and fulfill your desire of war.॥ 22-23॥ |
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