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mahabharat 5.95.8: हे कुरुश्रेष्ठ! यदि कौरव बाहर-भीतर (प्रकट और गुप्त) दुराचरण करने लगें, तो आप ही उन्हें रोककर सही मार्ग पर लगाने वाले हैं। 8॥   |   mahabharat अध्याय 5.95: कौरवसभामें श्रीकृष्णका प्रभावशाली भाषण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 95: कौरवसभामें श्रीकृष्णका प्रभावशाली भाषण  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.95.8 
त्वं हि धारयिता श्रेष्ठ: कुरूणां कुरुसत्तम।
मिथ्या प्रचरतां तात बाह्येष्वाभ्यन्तरेषु च॥ ८॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ! यदि कौरव बाहर-भीतर (प्रकट और गुप्त) दुराचरण करने लगें, तो आप ही उन्हें रोककर सही मार्ग पर लगाने वाले हैं। 8॥
 
Tat Kurushrestha! If the Kauravas start misbehaving outside and inside (overtly and secretly), then you are the one who will stop them and set them on the right path. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)