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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 95: कौरवसभामें श्रीकृष्णका प्रभावशाली भाषण  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  5.95.63 
वैशम्पायन उवाच
तद् वाक्यं पार्थिवा: सर्वे हृदयै: समपूजयन्।
न तत्र कश्चिद् वक्तुं हि वाचं प्राक्रामदग्रत:॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भगवान श्रीकृष्ण के कथन का सभी राजाओं ने हृदय से आदर किया। वहाँ कोई भी आगे आकर उत्तर नहीं दे सका।
 
Vaishampayana says - Janamejaya! All the kings respected Lord Krishna's statement from their hearts. There no one could come forward to say anything in reply to it. 63.
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये पञ्चनवतितमोऽध्याय:॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कौरवसभामें श्रीकृष्णवाक्यविषयक

पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)