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वैशम्पायन उवाच
तद् वाक्यं पार्थिवा: सर्वे हृदयै: समपूजयन्।
न तत्र कश्चिद् वक्तुं हि वाचं प्राक्रामदग्रत:॥ ६३॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भगवान श्रीकृष्ण के कथन का सभी राजाओं ने हृदय से आदर किया। वहाँ कोई भी आगे आकर उत्तर नहीं दे सका।
Vaishampayana says - Janamejaya! All the kings respected Lord Krishna's statement from their hearts. There no one could come forward to say anything in reply to it. 63.
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये पञ्चनवतितमोऽध्याय:॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कौरवसभामें श्रीकृष्णवाक्यविषयक
पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥