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mahabharat 5.95.10: हे पुरुषरत्न! ये लोग अपने ही कुलीन बन्धुओं के साथ अशिष्ट व्यवहार करते हैं। इनके हृदय में लोभ इतना व्याप्त हो गया है कि इन्होंने धर्म की मर्यादा तोड़ दी है। यह बात आप भली-भाँति जानते हैं॥10॥   |   mahabharat अध्याय 5.95: कौरवसभामें श्रीकृष्णका प्रभावशाली भाषण   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 95: कौरवसभामें श्रीकृष्णका प्रभावशाली भाषण  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.95.10 
अशिष्टा गतमर्यादा लोभेन हृतचेतस:।
स्वेषु बन्धुषु मुख्येषु तद् वेत्थ पुरुषर्षभ॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषरत्न! ये लोग अपने ही कुलीन बन्धुओं के साथ अशिष्ट व्यवहार करते हैं। इनके हृदय में लोभ इतना व्याप्त हो गया है कि इन्होंने धर्म की मर्यादा तोड़ दी है। यह बात आप भली-भाँति जानते हैं॥10॥
 
O gem of men! They behave rudely with their own noble relatives. Greed has so taken over their hearts that they have broken the limits of religion. You know this very well.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)