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mahabharat 5.93.1-2: श्री भगवान बोले - विदुर जी! जो बात एक महान बुद्धिमान पुरुष कह सकता है, जो बात एक विद्वान पुरुष उपदेश दे सकता है, जो बात आप जैसे हितैषी को मेरे जैसे मित्र से कहनी उचित है तथा जो धर्म और अर्थ से पूर्ण सत्य वचन आपके मुख से निकलने चाहिए, वही बात आपने माता-पिता के समान स्नेहपूर्वक मुझसे कही है॥1-2॥   |   mahabharat अध्याय 5.93: श्रीकृष्णका कौरव-पाण्डवोंमें संधिस्थापनके प्रयत्नका औचित्य बताना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 93: श्रीकृष्णका कौरव-पाण्डवोंमें संधिस्थापनके प्रयत्नका औचित्य बताना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  5.93.1-2 
श्रीभगवानुवाच
यथा ब्रूयान्महाप्राज्ञो यथा ब्रूयाद् विचक्षण:।
यथा वाच्यस्त्वद्विधेन भवता मद्विध: सुहृत्॥ १॥
धर्मार्थयुक्तं तथ्यं च यथा त्वय्युपपद्यते।
तथा वचनमुक्तोऽस्मि त्वयैतत् पितृमातृवत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले - विदुर जी! जो बात एक महान बुद्धिमान पुरुष कह सकता है, जो बात एक विद्वान पुरुष उपदेश दे सकता है, जो बात आप जैसे हितैषी को मेरे जैसे मित्र से कहनी उचित है तथा जो धर्म और अर्थ से पूर्ण सत्य वचन आपके मुख से निकलने चाहिए, वही बात आपने माता-पिता के समान स्नेहपूर्वक मुझसे कही है॥1-2॥
 
Shri Bhagwan said - Vidur ji! What a great intelligent man can say, what a learned man can advise, what is appropriate for a well-wisher like you to say to a friend like me and what true words full of Dharma and meaning should come out of your mouth, you have said the same thing to me with affection like a parent.॥ 1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)