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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 92: विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.92.6 
एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्दोषैरेव समन्वित:।
त्वयोच्यमान: श्रेयोऽपि संरम्भान्न ग्रहीष्यति॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उसमें ये और भी बहुत से दोष भरे पड़े हैं। यदि आप उसे कोई हितकारी बात भी बताएँ, तो भी वह क्रोध के कारण उसे स्वीकार नहीं करता।
 
‘He is filled with these and many other faults. Even if you tell him something beneficial, he will not accept it due to anger.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)