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mahabharat 5.92.5: वह सर्वथा विवेकशून्य है, उसकी बुद्धि किसी एक निश्चय पर केन्द्रित नहीं रहती, वह अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर सकता, वह अपनी ही इच्छाओं का अनुसरण करता है और सब विषयों में अनिश्चित विचार रखता है॥5॥   |   mahabharat अध्याय 5.92: विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 92: विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  5.92.5 
मूढश्चाकृतबुद्धिश्च इन्द्रियाणामनीश्वर:।
कामानुसारी कृत्येषु सर्वेष्वकृतनिश्चय:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वह सर्वथा विवेकशून्य है, उसकी बुद्धि किसी एक निश्चय पर केन्द्रित नहीं रहती, वह अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर सकता, वह अपनी ही इच्छाओं का अनुसरण करता है और सब विषयों में अनिश्चित विचार रखता है॥5॥
 
‘He is completely devoid of discernment, his intellect does not remain focused on any one decision and he is unable to control his senses. He follows his own desires and has uncertain ideas in all matters.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)