श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 92: विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना  »  श्लोक 27-29
 
 
श्लोक  5.92.27-29 
तेषां समुपविष्टानां बहूनां दुष्टचेतसाम्।
कथं मध्यं प्रपद्येथा: शत्रूणां शत्रुकर्शन॥ २७॥
सर्वथा त्वं महाबाहो देवैरपि दुरुत्सह:।
प्रभावं पौरुषं बुद्धिं जानामि तव शत्रुहन्॥ २८॥
या मे प्रीति: पाण्डवेषु भूय: सा त्वयि माधव।
प्रेम्णा च बहुमानाच्च सौहृदाच्च ब्रवीम्यहम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
शत्रुसूदन! तुम बुरे विचारों से युक्त बैठे हुए बहुत से शत्रुओं के बीच कैसे जाना चाहते हो? हे शत्रुओं का संहार करने वाले महाबाहु श्रीकृष्ण! यद्यपि समस्त देवता भी तुम्हारे सामने टिक नहीं सकते और मैं तुम्हारे प्रभाव, पराक्रम और बुद्धिमत्ता को जानता हूँ; तथापि माधव! पाण्डवों के प्रति मेरा प्रेम उतना ही है, बल्कि उससे भी अधिक तुम्हारे प्रति है। अतः प्रेम, महान आदर और सौहार्द से प्रेरित होकर मैं यह कह रहा हूँ॥ 27-29॥
 
‘Shatrusudan! How can you wish to go amidst a large number of enemies sitting with evil thoughts? O mighty-armed Sri Krishna, the slayer of enemies! Although even all the gods cannot stand before you and I know your influence, valour and intelligence; yet Madhav! The love I have for the Pandavas is the same and even more for you. Therefore, inspired by love, great respect and cordiality, I am saying this.॥ 27-29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)