श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 92: विदुरजीका धृतराष्ट्रपुत्रोंकी दुर्भावना बताकर श्रीकृष्णको उनके कौरवसभामें जानेका अनौचित्य बतलाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.92.1 
वैशम्पायन उवाच
तं भुक्तवन्तमाश्वस्तं निशायां विदुरोऽब्रवीत्।
नेदं सम्यग् व्यवसितं केशवागमनं तव॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - 'हे जनमेजय! रात्रि के समय जब भगवान श्रीकृष्ण भोजन करके विश्राम कर रहे थे, तब विदुरजी ने उनसे कहा - 'केशव! मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि तुमने यहाँ आने का निश्चय किया।
 
Vaishmpayana says - 'O Janamejaya! At night when Lord Krishna was taking rest after having his meal, Vidurji said to him - 'Keshav! I do not think it is good that you decided to come here.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)