श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 91: श्रीकृष्णका दुर्योधनके घर जाना एवं उसके निमन्त्रणको अस्वीकार करके विदुरजीके घरपर भोजन करना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.91.31 
अथ यो गुणसम्पन्नान् हृदयस्याप्रियानपि।
प्रियेण कुरुते वश्यांश्चिरं यशसि तिष्ठति॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जो अपने प्रिय आचरण से अप्रिय गुणवानों को भी वश में कर लेता है, वह दीर्घकाल तक प्रसिद्ध रहता है॥31॥
 
He who controls even those virtuous people who are not liked by him by his pleasant behaviour, remains famous for a long time.॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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