श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 91: श्रीकृष्णका दुर्योधनके घर जाना एवं उसके निमन्त्रणको अस्वीकार करके विदुरजीके घरपर भोजन करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.91.30 
य: कल्याणगुणान् ज्ञातीन् मोहाल्लोभाद् दिदृक्षते।
सोऽजितात्माजितक्रोधो न चिरं तिष्ठति श्रियम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति आसक्ति और लोभ की दृष्टि से अपने परिवार के सदस्यों को शुभ गुणों से युक्त देखना चाहता है तथा जो अपने मन और क्रोध को वश में नहीं कर सकता, वह अधिक समय तक राजसी धन का उपभोग नहीं कर सकता ॥30॥
 
A person who wishes to see his family members endowed with auspicious qualities with the eyes of attachment and greed, and who cannot control his mind and anger cannot enjoy the royal wealth for long. ॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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