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श्लोक 5.91.3-4h  |
तस्य कक्ष्या व्यतिक्रम्य तिस्रो द्वा:स्थैरवारित:।
ततोऽभ्रघनसंकाशं गिरिकूटमिवोच्छ्रितम्॥ ३॥
श्रिया ज्वलन्तं प्रासादमारुरोह महायशा:। |
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| अनुवाद |
| द्वारपालों ने फिर भी नहीं रोका। उस राजमहल के तीनों द्वार पार करके तेजस्वी श्रीकृष्ण एक ऐसे महल पर विराजमान हुए जो आकाश में शरद ऋतु के मेघों के समान श्वेत, पर्वत शिखर के समान ऊँचा और उसकी अद्भुत ज्योति से प्रकाशित था। 3 1/2॥ |
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| The gatekeepers did not stop. After crossing the three doors of that royal palace, the glorious Shri Krishna sat on a palace which was as white as the autumn clouds in the sky, as high as a mountain peak and illuminated with its amazing light. 3 1/2॥ |
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