श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 91: श्रीकृष्णका दुर्योधनके घर जाना एवं उसके निमन्त्रणको अस्वीकार करके विदुरजीके घरपर भोजन करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  5.91.27 
अकस्माच्चैव पार्थानां द्वेषणं नोपपद्यते।
धर्मे स्थिता: पाण्डवेया: कस्तान् किं वक्तुमर्हति॥ २७॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीपुत्रों से अकारण बैर रखना तुम्हारे लिए उचित नहीं है। पाण्डव तो सदैव अपने धर्म पर दृढ़ रहते हैं, अतः उनके विरुद्ध कौन कुछ कह सकता है?॥ 27॥
 
It is not right for you to bear enmity towards the sons of Kunti without any reason. The Pandavas always remain steadfast in their Dharma, so who can say anything against them?॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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