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श्लोक 5.91.25  |
सम्प्रीतिभोज्यान्यन्नानि आपद्भोज्यानि वा पुन:।
न च सम्प्रीयसे राजन् न चैवापद्गता वयम्॥ २५॥ |
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| अनुवाद |
| किसी के घर का भोजन या तो प्रेम से खाया जाता है या फिर विपत्ति में। हे मनुष्यों के स्वामी! आप दूसरों से प्रेम नहीं करते और हम किसी विपत्ति में नहीं हैं॥ 25॥ |
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| ‘Food at someone's house is either eaten out of love or when one is in trouble. O Lord of men! You do not love others and we are not in any trouble.॥ 25॥ |
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