श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 91: श्रीकृष्णका दुर्योधनके घर जाना एवं उसके निमन्त्रणको अस्वीकार करके विदुरजीके घरपर भोजन करना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  5.91.16-17 
वैशम्पायन उवाच
स एवमुक्तो गोविन्द: प्रत्युवाच महामना:।
उद्यन्मेघस्वन: काले प्रगृह्य विपुलं भुजम्॥ १६॥
अलघूकृतमग्रस्तमनिरस्तमसंकुलम्।
राजीवनेत्रो राजानं हेतुमद् वाक्यमुत्तमम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! इस प्रकार पूछे जाने पर उस समय महामनस्वी कमलनयन श्रीकृष्ण ने अपनी विशाल भुजा उठाकर जलवाहक के समान गम्भीर वाणी से राजा दुर्योधन को उत्तर देना आरम्भ किया। उनका वह वचन अत्यन्त उत्तम, युक्तिसंगत, दयारहित, प्रत्येक अक्षर की स्पष्टता से सुशोभित तथा भ्रम, संकीर्णता आदि दोषों से रहित था। 16-17॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! When asked in this manner, at that time, Mahamanasvi Kamalanayan Shri Krishna raised his huge arm and started answering King Duryodhana in a serious voice like a water bearer. That word of his was extremely excellent, logical, free from pity, adorned with clarity of each letter and free from defects like confusion, narrowness etc. 16-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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