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mahabharat 5.90.7: केशव! महाबली पाण्डव वन जाते समय मेरे हृदय को भी अपने साथ घसीटकर ले गए। वे वनवास के योग्य तो थे ही नहीं। फिर उन्हें यह कष्ट क्यों सहना पड़ा?॥7॥   |   mahabharat अध्याय 5.90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  5.90.7 
अहार्षुश्च वनं यान्त: समूलं हृदयं मम।
अतदर्हा महात्मान: कथं केशव पाण्डवा:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
केशव! महाबली पाण्डव वन जाते समय मेरे हृदय को भी अपने साथ घसीटकर ले गए। वे वनवास के योग्य तो थे ही नहीं। फिर उन्हें यह कष्ट क्यों सहना पड़ा?॥7॥
 
Keshav! While going to the forest, the great Pandavas dragged my heart along with it, completely rooted and taken it with them. They were never fit for exile. Then how did they have to go through this pain?॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)