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mahabharat 5.90.53: उस कौरव सभा में मैं विदुरजी को (जिन्होंने द्रौपदी के साथ हुए अन्याय का खुलकर विरोध किया था) सबसे अधिक आदर देता हूँ। मनुष्य अपने अच्छे आचरण से ही महान बनता है, धन और विद्या से नहीं॥ 53॥   |   mahabharat अध्याय 5.90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  5.90.53 
तस्यां संसदि सर्वेषां क्षत्तारं पूजयाम्यहम्।
वृत्तेन हि भवत्यार्यो न धनेन न विद्यया॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
उस कौरव सभा में मैं विदुरजी को (जिन्होंने द्रौपदी के साथ हुए अन्याय का खुलकर विरोध किया था) सबसे अधिक आदर देता हूँ। मनुष्य अपने अच्छे आचरण से ही महान बनता है, धन और विद्या से नहीं॥ 53॥
 
In that Kaurava assembly I give the most respect to Vidurji (who had openly opposed the injustice done to Draupadi). A man becomes great only by his good conduct, not by wealth and knowledge.॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)