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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.90.4 
साब्रवीत् कृष्णमासीनं कृतातिथ्यं युधां पतिम्।
बाष्पगद्‍गदपूर्णेन मुखेन परिशुष्यता॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने योद्धाओं के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण का अतिथि के रूप में स्वागत किया। जब वे आतिथ्य स्वीकार करके अपने आसन पर बैठे, तब कुन्तीदेवी शुष्क मुख और अश्रुपूरित कण्ठ से इस प्रकार बोलीं -॥4॥
 
They welcomed Lord Krishna, the lord of warriors, as guests. When he accepted the hospitality and sat on his seat, Kuntidevi spoke with a dry mouth and a tearful throat as follows -॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)