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mahabharat 5.90.22-27: मधुसूदन! महाबली पाण्डवपुत्र भीमसेन दस हजार हाथियों के समान बलवान हैं, जिनका वेग वायु के समान है, जो असहिष्णु होते हुए भी अपने भाई के प्रिय हैं और सदैव अपने भाइयों से प्रेम करने में लगे रहते हैं, जिन्होंने अपने भाइयों सहित कीचक का नाश कर दिया है, वे वीर योद्धा जिनके हाथों क्रोधवश, हिडिम्बासुर और बक नामक दैत्यों का भी वध हुआ है, जो पराक्रम में इन्द्र के समान, बल में वायुदेव के समान और क्रोध में महेश्वर के समान हैं, जो आक्रमणकारी योद्धाओं में श्रेष्ठ और प्रचण्ड हैं, शत्रुओं को संताप देने वाले पाण्डुपुत्र भीमसेन, जो अपने अन्दर क्रोध, बल और क्रोध को धारण करते हुए भी अपने मन को वश में रखते हैं और सदैव अपने भाई की आज्ञा में रहते हैं, जो स्वभाव से ही निर्दयी हैं, जिनमें बहुत तेज है, जो महात्मा हैं, श्रेष्ठ हैं, अनन्त कांतिवान हैं और देखने में भी भयंकर हैं, वृष्णिनन्दन जनार्दन! मेरे उस दूसरे पुत्र भीमसेन के विषय में मुझे बताइये। मेरे मध्यम पुत्र पाण्डुपुत्र भीमसेन, जिनकी भुजाएँ परिघ के समान बलवान हैं, इस समय कैसे हैं?॥ 22–27॥   |   mahabharat अध्याय 5.90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना  »  श्लोक 22-27
 
 
श्लोक  5.90.22-27 
य: स नागायुतप्राणो वातरंहा महाबल:।
सामर्ष: पाण्डवो नित्यं प्रियो भ्रातु: प्रियंकर:॥ २२॥
कीचकस्य तु सज्ञातेर्यो हन्ता मधुसूदन।
शूर: क्रोधवशानां च हिडिम्बस्य बकस्य च॥ २३॥
पराक्रमे शक्रसमो मातरिश्वसमो बले।
महेश्वरसम: क्रोधे भीम: प्रहरतां वर:॥ २४॥
क्रोधं बलममर्षं च यो निधाय परंतप:।
जितात्मा पाण्डवोऽमर्षी भ्रातुस्तिष्ठति शासने॥ २५॥
तेजोराशिं महात्मानं वरिष्ठममितौजसम्।
भीमं प्रदर्शनेनापि भीमसेनं जनार्दन॥ २६॥
तं ममाचक्ष्व वार्ष्णेय कथमद्य वृकोदर:।
आस्ते परिघबाहु: स मध्यम: पाण्डवो बली॥ २७॥
 
 
अनुवाद
मधुसूदन! महाबली पाण्डवपुत्र भीमसेन दस हजार हाथियों के समान बलवान हैं, जिनका वेग वायु के समान है, जो असहिष्णु होते हुए भी अपने भाई के प्रिय हैं और सदैव अपने भाइयों से प्रेम करने में लगे रहते हैं, जिन्होंने अपने भाइयों सहित कीचक का नाश कर दिया है, वे वीर योद्धा जिनके हाथों क्रोधवश, हिडिम्बासुर और बक नामक दैत्यों का भी वध हुआ है, जो पराक्रम में इन्द्र के समान, बल में वायुदेव के समान और क्रोध में महेश्वर के समान हैं, जो आक्रमणकारी योद्धाओं में श्रेष्ठ और प्रचण्ड हैं, शत्रुओं को संताप देने वाले पाण्डुपुत्र भीमसेन, जो अपने अन्दर क्रोध, बल और क्रोध को धारण करते हुए भी अपने मन को वश में रखते हैं और सदैव अपने भाई की आज्ञा में रहते हैं, जो स्वभाव से ही निर्दयी हैं, जिनमें बहुत तेज है, जो महात्मा हैं, श्रेष्ठ हैं, अनन्त कांतिवान हैं और देखने में भी भयंकर हैं, वृष्णिनन्दन जनार्दन! मेरे उस दूसरे पुत्र भीमसेन के विषय में मुझे बताइये। मेरे मध्यम पुत्र पाण्डुपुत्र भीमसेन, जिनकी भुजाएँ परिघ के समान बलवान हैं, इस समय कैसे हैं?॥ 22–27॥
 
Madhusudana! The mighty Bhima, son of Pandava, is as strong as ten thousand elephants, whose speed is like the wind, who, despite being intolerant, is always dear to his brother and is always engaged in loving his brothers, who has destroyed Keechaka along with his brothers, the brave warrior whose hands have also killed the demons named Krodhavash, Hidimbasur and Bak, who is equal to Indra in valour, Vayudev in strength and Maheshwar in anger, who is the best and fiercest among the attacking warriors, the son of Pandu who torments his enemies, who, despite having anger, strength and anger within himself, keeps his mind under control and always remains under the command of his brother, who is naturally merciless, who has an abundance of brilliance, who is a great soul, the best, infinitely radiant and is also fearsome to look at, Vrishninandan Janardan! Tell me about that second son of mine, Bhimasena. How is my middle son, Bhimasena, the son of Pandu, who has arms as strong as Parigha, at this time?॥ 22–27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)