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mahabharat 5.90.17-21: श्री कृष्ण! जो निर्लज्ज हैं, सत्य को धारण करते हैं, उत्तम इन्द्रियों वाले हैं और सब प्राणियों पर दया करते हैं; जो काम और द्वेष को वश में करके सत्पुरुषों के मार्ग पर चलते हैं; जो अम्बरीष, मान्धाता, ययाति, नहुष, भरत, दिलीप और उशीनरपुत्र शिबि आदि प्राचीन ऋषियों के सद्गुणों का पालन करते हैं, जो कठिन धर्म की धुरी धारण करते हैं; जो शील और सदाचार रूपी धन से युक्त हैं, जो धर्मनिष्ठ, सत्यनिष्ठ और सम्पूर्ण गुणों से युक्त होने के कारण इस पृथ्वी के ही नहीं, अपितु तीनों लोकों के भी राजा हो सकते हैं; जिनका मन सदैव धर्म में लगा रहता है, जो धर्मज्ञान और सदाचार की दृष्टि से समस्त कौरवों में श्रेष्ठ हैं; जिनके शरीर की कांति शुद्ध बैंगनी और सुवर्ण के समान चमकीली है, जो सबको मनोहर लगते हैं; वे महाबाहु अजातशत्रु युधिष्ठिर इस समय कैसे हैं? 17-21॥   |   mahabharat अध्याय 5.90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना  »  श्लोक 17-21
 
 
श्लोक  5.90.17-21 
ह्रीमान् सत्यधृतिर्दान्तो भूतानामनुकम्पिता॥ १७॥
कामद्वेषौ वशे कृत्वा सतां वर्त्मानुवर्तते।
अम्बरीषस्य मान्धातुर्ययातेर्नहुषस्य च॥ १८॥
भरतस्य दिलीपस्य शिबेरौशीनरस्य च।
राजर्षीणां पुराणानां धुरं धत्ते दुरुद्वहाम्॥ १९॥
शीलवृत्तोपसम्पन्नो धर्मज्ञ: सत्यसंगर:।
राजा सर्वगुणोपेतस्त्रैलोक्यस्यापि यो भवेत्॥ २०॥
अजातशत्रुर्धर्मात्मा शुद्धजाम्बूनदप्रभ:।
श्रेष्ठ: कुरुषु सर्वेषु धर्मत: श्रुतवृत्तत:।
प्रियदर्शो दीर्घभुज: कथं कृष्ण युधिष्ठिर:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! जो निर्लज्ज हैं, सत्य को धारण करते हैं, उत्तम इन्द्रियों वाले हैं और सब प्राणियों पर दया करते हैं; जो काम और द्वेष को वश में करके सत्पुरुषों के मार्ग पर चलते हैं; जो अम्बरीष, मान्धाता, ययाति, नहुष, भरत, दिलीप और उशीनरपुत्र शिबि आदि प्राचीन ऋषियों के सद्गुणों का पालन करते हैं, जो कठिन धर्म की धुरी धारण करते हैं; जो शील और सदाचार रूपी धन से युक्त हैं, जो धर्मनिष्ठ, सत्यनिष्ठ और सम्पूर्ण गुणों से युक्त होने के कारण इस पृथ्वी के ही नहीं, अपितु तीनों लोकों के भी राजा हो सकते हैं; जिनका मन सदैव धर्म में लगा रहता है, जो धर्मज्ञान और सदाचार की दृष्टि से समस्त कौरवों में श्रेष्ठ हैं; जिनके शरीर की कांति शुद्ध बैंगनी और सुवर्ण के समान चमकीली है, जो सबको मनोहर लगते हैं; वे महाबाहु अजातशत्रु युधिष्ठिर इस समय कैसे हैं? 17-21॥
 
Sri Krishna! Who are unashamed, possessing the truth, having good senses and having mercy on all living beings; Those who control lust and hatred and follow the path of good men; Those who follow the virtues of ancient sages like Ambarish, Mandhata, Yayati, Nahush, Bharat, Dilip and Ushinarputra Shibi etc., who hold the axis of difficult religion; Who is filled with the wealth of modesty and good conduct, who, because of being religious, committed to truth and having all the virtues, can be the king not only of this earth but also of all the three worlds; Whose mind is always engaged in religion, who is the best among all the Kauravas in terms of religious knowledge and good conduct; Whose body glow is as bright as pure purple and gold, who looks lovely to everyone; How is that great-armed Ajatashatru Yudhishthir at this time? 17-21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)