श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना  » 
 
 
अध्याय 90: श्रीकृष्णका कुन्तीके समीप जाना एवं युधिष्ठिरका कुशल-समाचार पूछकर अपने दु:खोंका स्मरण करके विलाप करती हुई कुन्तीको आश्वासन देना
 
श्लोक 1:  वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! शत्रुदमन श्रीकृष्ण विदुरजी से मिलकर दिन के तीसरे पहर में अपनी बुआ कुन्तीदेवी के पास गये।
 
श्लोक 2:  शुद्ध सूर्य के समान तेजस्वी श्रीकृष्ण को आते देख, कुन्तीदेवी ने उन्हें हृदय से लगा लिया और अपने पुत्रों का स्मरण करके अत्यन्त विलाप करने लगीं॥2॥
 
श्लोक 3:  बहुत समय के बाद कुन्तीदेवी अपने बलवान पुत्रों के बीच निवास करने वाले तथा उनके साथ विहार करने वाले वृष्णिकुलनन्दन गोविन्द को देखकर आँसू बहाने लगीं॥3॥
 
श्लोक 4:  उन्होंने योद्धाओं के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण का अतिथि के रूप में स्वागत किया। जब वे आतिथ्य स्वीकार करके अपने आसन पर बैठे, तब कुन्तीदेवी शुष्क मुख और अश्रुपूरित कण्ठ से इस प्रकार बोलीं -॥4॥
 
श्लोक 5:  बालक! मेरे पुत्र पाण्डव, जो बचपन से ही गुरुजनों की सेवा में तत्पर रहते थे, परस्पर प्रेम रखते थे, सर्वत्र सम्मान पाते थे और सबके प्रति समान भाव रखते थे, वे शत्रुओं के हठ का शिकार होकर अपना राज्य खो बैठे और प्रजा में रहने योग्य होते हुए भी निर्जन वन में चले गए॥5॥
 
श्लोक 6:  मेरे पुत्रों ने हर्ष और क्रोध को जीत लिया था। वे ब्राह्मणों के हितैषी और सत्यवादी थे; तथापि (शत्रुओं के अन्याय से विवश होकर) वे प्रियजनों और सुखों से विमुख हो गए और मुझे रोता-बिलखता छोड़कर वन की ओर चले गए॥6॥
 
श्लोक 7:  केशव! महाबली पाण्डव वन जाते समय मेरे हृदय को भी अपने साथ घसीटकर ले गए। वे वनवास के योग्य तो थे ही नहीं। फिर उन्हें यह कष्ट क्यों सहना पड़ा?॥7॥
 
श्लोक 8-9h:  पिताजी! बचपन में ही उन्हें पिता के प्यार से वंचित कर दिया गया। मैंने ही उन्हें पाला-पोसा। शेरों, बाघों और हाथियों से भरे उस विशाल जंगल में मेरे बेटे कैसे रहते? माता-पिता को देखे बिना वे उस विशाल जंगल में कैसे रहते?
 
श्लोक 9-10h:  केशव! बचपन से ही पाण्डवों को शंख और दुन्दुभियों की गम्भीर ध्वनि, मृदंग की मधुर ध्वनि और बाँसुरी की मधुर धुनों ने जगाया था। 9 1/2॥
 
श्लोक 10-15h:  जब वे अपनी राजधानी के ऊँचे बुर्जों में मृगचर्म से बने कोमल बिस्तरों पर सोते थे, तब हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की हिनहिनाहट और रथ के पहियों की घरघराहट से उनकी नींद टूट जाती थी। शंख और तुरही की तीव्र ध्वनि तथा वेणु और वीणा की मधुर ध्वनि से उनकी नींद खुल जाती थी। साथ ही, ब्राह्मण भी पुण्याहवाचन की पवित्र ध्वनि से उनका सम्मान करते थे। श्रेष्ठ ब्राह्मणों के शुभ आशीर्वाद सुनकर वे जाग जाते थे। पूजनीय और पूजनीय पुरुष भी उनकी स्तुति गाकर उनका अभिवादन करते थे और उठने पर वे ब्राह्मणों का रत्न, वस्त्र और आभूषणों से पूजन करते थे। हे जनार्दन! वही पाण्डव उस विशाल वन में जंगली पशुओं के क्रूर वचन सुनकर अच्छी तरह सो नहीं पाते होंगे, यद्यपि वे ऐसी दयनीय स्थिति के कभी योग्य नहीं थे।
 
श्लोक 15-17h:  मधुसूदन! जो लोग तुरही और नगाड़ों की ध्वनि, शंख और वंशी की ध्वनि, स्त्रियों के मधुर गीतों की ध्वनि तथा सूत, मागध और बंदीगणों की स्तुति से जागते थे, वे विशाल वनों में हिंसक पशुओं की कर्कश ध्वनि से कैसे जागते होंगे?
 
श्लोक 17-21:  श्री कृष्ण! जो निर्लज्ज हैं, सत्य को धारण करते हैं, उत्तम इन्द्रियों वाले हैं और सब प्राणियों पर दया करते हैं; जो काम और द्वेष को वश में करके सत्पुरुषों के मार्ग पर चलते हैं; जो अम्बरीष, मान्धाता, ययाति, नहुष, भरत, दिलीप और उशीनरपुत्र शिबि आदि प्राचीन ऋषियों के सद्गुणों का पालन करते हैं, जो कठिन धर्म की धुरी धारण करते हैं; जो शील और सदाचार रूपी धन से युक्त हैं, जो धर्मनिष्ठ, सत्यनिष्ठ और सम्पूर्ण गुणों से युक्त होने के कारण इस पृथ्वी के ही नहीं, अपितु तीनों लोकों के भी राजा हो सकते हैं; जिनका मन सदैव धर्म में लगा रहता है, जो धर्मज्ञान और सदाचार की दृष्टि से समस्त कौरवों में श्रेष्ठ हैं; जिनके शरीर की कांति शुद्ध बैंगनी और सुवर्ण के समान चमकीली है, जो सबको मनोहर लगते हैं; वे महाबाहु अजातशत्रु युधिष्ठिर इस समय कैसे हैं? 17-21॥
 
श्लोक 22-27:  मधुसूदन! महाबली पाण्डवपुत्र भीमसेन दस हजार हाथियों के समान बलवान हैं, जिनका वेग वायु के समान है, जो असहिष्णु होते हुए भी अपने भाई के प्रिय हैं और सदैव अपने भाइयों से प्रेम करने में लगे रहते हैं, जिन्होंने अपने भाइयों सहित कीचक का नाश कर दिया है, वे वीर योद्धा जिनके हाथों क्रोधवश, हिडिम्बासुर और बक नामक दैत्यों का भी वध हुआ है, जो पराक्रम में इन्द्र के समान, बल में वायुदेव के समान और क्रोध में महेश्वर के समान हैं, जो आक्रमणकारी योद्धाओं में श्रेष्ठ और प्रचण्ड हैं, शत्रुओं को संताप देने वाले पाण्डुपुत्र भीमसेन, जो अपने अन्दर क्रोध, बल और क्रोध को धारण करते हुए भी अपने मन को वश में रखते हैं और सदैव अपने भाई की आज्ञा में रहते हैं, जो स्वभाव से ही निर्दयी हैं, जिनमें बहुत तेज है, जो महात्मा हैं, श्रेष्ठ हैं, अनन्त कांतिवान हैं और देखने में भी भयंकर हैं, वृष्णिनन्दन जनार्दन! मेरे उस दूसरे पुत्र भीमसेन के विषय में मुझे बताइये। मेरे मध्यम पुत्र पाण्डुपुत्र भीमसेन, जिनकी भुजाएँ परिघ के समान बलवान हैं, इस समय कैसे हैं?॥ 22–27॥
 
श्लोक 28-34:  ‘श्रीकृष्ण! जो अर्जुन दो भुजाओं वाला होकर भी प्राचीन काल के सहस्त्रबाहु कार्तवीर्य अर्जुन के साथ सदैव मुकाबला करता है; केशव! जो पाँच सौ बाणों को समान वेग से चलाता है, वह पाण्डव अर्जुन धनुर्विद्या में राजा कार्तवीर्य के समान माना जाता है, जिसका तेज सूर्य के समान है, जो संयम में महर्षियों के समान है, क्षमा में पृथ्वी के समान है और पराक्रम में देवराज इन्द्र के समान है; मधुसूदन! कौरवों का यह विशाल साम्राज्य, जो समस्त राजाओं में विख्यात एवं यशस्वी है, जिसे अर्जुन ने अपने पराक्रम से विस्तृत किया है; जिसके बाहुबल पर समस्त पाण्डव आश्रित हैं; जो समस्त रथियों में श्रेष्ठ तथा सत्यनिष्ठ एवं पराक्रमी है, उसके विरुद्ध युद्ध में जाने पर कोई भी जीवित नहीं लौटता; हे अच्युत! जो समस्त प्राणियों को परास्त करने में समर्थ है, विजयी एवं अजेय है तथा जो समस्त पाण्डवों का आधार है; जैसे इन्द्र देवताओं का आधार है, उसी प्रकार इस समय आपके भाई एवं मित्र अर्जुन का क्या हाल है? 28–34.
 
श्लोक 35-38:  मधुसूदन श्रीकृष्ण! जो सम्पूर्ण प्राणियों पर दया करने वाले, विनयशील, शस्त्रविद्या में निपुण, सौम्य, कोमल, धार्मिक और मुझे अत्यन्त प्रिय हैं; जो महान धनुर्धर और युद्धभूमि में शोभा पाने वाले पराक्रमी योद्धा हैं, जो समस्त भाइयों के सेवक हैं, जो धर्म और अर्थ की चर्चा में कुशल हैं और जो पूर्ण यौवन से युक्त हैं; जो शुभ आचरण वाले महापुरुष हैं और जिनके आचरण की प्रशंसा समस्त भाई करते हैं, जो अपने बड़े भाई से स्नेह करते हैं, जो युद्ध में अग्रणी हैं और जो सदैव मेरी सेवा में तत्पर रहते हैं; उन वीर माद्रीपुत्र सहदेव के विषय में मुझे बताइए॥ 35-38॥
 
श्लोक 39-40:  श्री कृष्ण! जो सुकुमार, तरुण, वीरता से युक्त और सुन्दर है, जो सब भाइयों से बाहर विचरण करने वाला प्राणों का प्रिय स्वरूप है, जिसमें युद्ध की विचित्र कला दिखाई देती है, वह महाधनुर्धर, पराक्रमी और मुझसे उत्पन्न हुआ मेरा पुत्र पाण्डु नन्दन नकुल सुरक्षित है न? 39-40॥
 
श्लोक 41:  महाबाहो! क्या मैं उस सौम्य योद्धा नकुल को फिर कभी देख सकूँगा, जो सुख भोगने में समर्थ है, परन्तु दुःख सहने में असमर्थ है?॥ 41॥
 
श्लोक 42:  वीर! पहले तो पलकें गिरने तक भी नकुल से वियोग होने पर मेरा धैर्य जवाब दे जाता था; पर अब इतने दिनों तक उसे देखे बिना रह रही हूँ। देखो, मैं कितनी निर्दयी हूँ। 42।
 
श्लोक 43:  जनार्दन! द्रुपद की पुत्री कृष्णा मुझे अपने सभी पुत्रों से अधिक प्रिय है। वह कुलीन, अतुलनीय रूपवती और समस्त गुणों से संपन्न है॥ 43॥
 
श्लोक 44:  सत्यव्रती द्रौपदी, जो अपने पति के लोक को अपने पुत्रों के लोक से श्रेष्ठ मानती थी, अपने प्रिय पुत्रों को भी त्यागकर पाण्डवों का अनुसरण करती है।
 
श्लोक 45:  अच्युत! मैंने उसे सब प्रकार से सम्मानित किया है, वह अत्यंत श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुई शुभ रानी द्रौपदी इन दिनों कैसी है?॥ 45॥
 
श्लोक 46:  हाय! वह महान धनुर्धर, पराक्रमी योद्धा, युद्ध में निपुण और पाँच पतियों से युक्त, अग्नि के समान तेजस्वी द्रौपदीपुत्री श्रीकृष्ण भी अभागी हो गयीं।
 
श्लोक 47:  हे शत्रुनाश! चौदह वर्ष हो गए हैं। इतने दिनों से मैंने पुत्रों के वियोग से दुःखी सत्यव्रती द्रौपदी को नहीं देखा।
 
श्लोक 48:  यदि द्रुपद की पुत्री ऐसे उत्तम आचरण और उत्तम कर्मों से संपन्न होकर भी शाश्वत सुख प्राप्त नहीं कर रही है, तो निश्चय ही यह कहना पड़ेगा कि मनुष्य पुण्य कर्मों से सुख प्राप्त नहीं करता ॥48॥
 
श्लोक 49-50h:  युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव मुझे द्रौपदी से ज़्यादा प्रिय नहीं हैं। द्रौपदी को दरबार में लाए जाने पर मुझे इससे ज़्यादा दुःख कभी नहीं हुआ।
 
श्लोक 50-51:  क्रोध और लोभसे व्याकुल दुष्ट दुर्योधनने रजस्वला और एक ही वस्त्र पहने हुए द्रौपदीको सभामें बुलाकर उसके पतिके पास खड़ा कर दिया। उस समय समस्त कौरवोंने उसे देखा॥50-51॥
 
श्लोक 52:  वहां राजा धृतराष्ट्र, महाराज बाह्लीक, कृपाचार्य, सोमदत्त तथा अन्य कौरव दुःख से भरे हुए बैठे थे।
 
श्लोक 53:  उस कौरव सभा में मैं विदुरजी को (जिन्होंने द्रौपदी के साथ हुए अन्याय का खुलकर विरोध किया था) सबसे अधिक आदर देता हूँ। मनुष्य अपने अच्छे आचरण से ही महान बनता है, धन और विद्या से नहीं॥ 53॥
 
श्लोक 54:  श्री कृष्ण! महात्मा विदुर का परम बुद्धिमान् एवं गम्भीर स्वभाव ही वह आभूषण है, जो सम्पूर्ण लोकों में विद्यमान (प्रसिद्ध) है॥54॥
 
श्लोक 55:  वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! श्रीकृष्ण को आते देख कुन्तीदेवी दुःखी और प्रसन्न हो गईं तथा अपने ऊपर आए हुए नाना प्रकार के दुःखों का वर्णन करने लगीं-॥55॥
 
श्लोक 56:  हे शत्रुओं का नाश करने वाले श्रीकृष्ण! क्या प्राचीनकाल के दुष्ट राजाओं द्वारा आरम्भ किया गया जुआ और शिकार का अभ्यास इन सब लोगों को सुखदायक सिद्ध हुआ है? (परन्तु कभी नहीं।)॥56॥
 
श्लोक 57:  धृतराष्ट्र के पुत्रों ने भरी सभा में कौरवों के सामने द्रौपदी का जो अपमान किया, जिससे किसी का भला नहीं हो सकता, वह मेरे हृदय को जलाता रहता है।
 
श्लोक 58:  परंतप जनार्दन! पाण्डवों का नगर से निकाला जाना और वन में रहने को विवश होना आदि अनेक प्रकार के कष्ट मैंने भोगे हैं ॥ 58॥
 
श्लोक 59:  परंतप माधव! मेरे बच्चों को अज्ञातवास में रहना पड़ा है और अब राज्य न मिलने के कारण उनकी जीविका भी बाधित हो गई है। मुझे अपने पुत्रों सहित ऐसा महान दुःख न सहना पड़े॥ 59॥
 
श्लोक 60:  दुर्योधन ने छल और जुए के द्वारा मेरे पुत्रों को राज्य से वंचित कर दिया। चौदह वर्ष हो गए हैं जब से वे इस दयनीय स्थिति में हैं। यदि सुख भोगने का अर्थ पुण्य कर्मों के फल का नाश करना है, तो चूँकि हमने पाप के फलस्वरूप दुःख भोगा है, अतः अब हमें भी दुःख भोगकर सुख भोगना चाहिए॥60॥
 
श्लोक 61-62h:  श्री कृष्ण! मैंने पांडवों और धृतराष्ट्र के पुत्रों के प्रति कभी कोई भेदभाव नहीं किया। इस सत्य के प्रभाव से मैं अवश्य देखूँगा कि आगामी युद्ध में शत्रुओं का संहार करके आप पांडवों सहित संकट से मुक्त हो जाएँ और देवी लक्ष्मी ने आपको ही वरण किया हो। पांडवों में वे सभी गुण हैं जिनके कारण शत्रु उन्हें पराजित नहीं कर सकते।
 
श्लोक 62-63h:  मैं अपने दुःख के लिए स्वयं को या दुर्योधन को दोष नहीं दे रहा हूँ; बल्कि मैं अपने पिता को दोष दे रहा हूँ, जिन्होंने मुझे राजा कुंतीभोज को उसी प्रकार सौंप दिया, जिस प्रकार प्रसिद्ध दानी पुरुष भिखारियों को साधारण धन दे देते हैं।
 
श्लोक 63-64h:  मैं बालक ही था और गेंद हाथ में लेकर खेलता था। उसी आयु में तुम्हारे पितामह ने मित्रता का धर्म निभाते हुए मुझे अपने मित्र महात्मा कुन्तीभोज को सौंप दिया।'
 
श्लोक 64:  परंतु श्री कृष्ण! इस प्रकार मेरे पिता और ससुर ने भी मेरे साथ छल किया है। इससे मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। मेरे जीवित रहने का क्या लाभ है?॥ 64॥
 
श्लोक 65-66:  अर्जुन के जन्म के समय, जब मैं प्रसूति-कक्ष में थी, उस रात्रि आकाशवाणी ने मुझसे कहा था - 'हे प्रिये! तुम्हारा यह पुत्र समस्त पृथ्वी पर विजय प्राप्त करेगा। इसकी कीर्ति स्वर्ग तक फैलेगी। यह महायुद्ध में कौरवों का वध करके राज्य पर अधिकार करेगा, तत्पश्चात अपने भाइयों के साथ मिलकर तीन अश्वमेध यज्ञ करेगा।'
 
श्लोक 67:  मैं इस दिव्य वाणी को दोष नहीं देता, अपितु महाविष्णु रूप धर्म को प्रणाम करता हूँ। वे इस जगत के रचयिता हैं। धर्म सदैव समस्त लोकों का पालन करता है॥ 67॥
 
श्लोक 68:  वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! यदि धर्म है, तो आप भी उन सभी कार्यों को पूरा करेंगे, जो उस समय आकाशवाणी द्वारा कहे गए थे।
 
श्लोक 69:  माधव! विधवापन, धन का नाश और कुटुम्बियों के प्रति बढ़ता हुआ द्वेष मुझे उतना दुःखी नहीं कर रहा है, जितना पुत्रों का वियोग मुझे दुःख से जला रहा है॥ 69॥
 
श्लोक 70:  जब तक मैं समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन को गांडीव धारण करते हुए न देख लूँ, तब तक मेरे हृदय को शांति कैसे मिलेगी?॥ 70॥
 
श्लोक 71:  गोविन्द! चौदह वर्ष हो गये, मैं युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और नकुल-सहदेव को नहीं देख पाया हूँ।
 
श्लोक 72:  जनार्दन! जो लोग प्राणों का नाश होने पर लुप्त हो जाते हैं, उनके लिए लोग श्राद्ध करते हैं। यदि मृत्यु का अर्थ लुप्त होना है, तो मेरे लिए पाण्डव मर गए हैं और मैं भी उनके लिए मर गया हूँ॥ 72॥
 
श्लोक 73:  माधव! तुम्हें धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर से कहना चाहिए - 'पुत्र! तुम्हारे धर्म की बड़ी हानि हो रही है। इसे व्यर्थ न गँवाओ।'
 
श्लोक 74:  वासुदेव! जो स्त्री दूसरों पर निर्भर होकर जीवनयापन करती है, उसे धिक्कार है। दुःख उठाकर जीविका कमाने से मर जाना अच्छा है। 74.
 
श्लोक 75:  हे भगवान कृष्ण! आप अर्जुन और युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहने वाले भीमसेन से कहिए कि जिस उद्देश्य से एक क्षत्राणी पुत्र को जन्म देती है, उसे पूरा करने का समय आ गया है।
 
श्लोक 76-77:  यदि ऐसा समय आने पर भी तुम युद्ध नहीं करोगे, तो वह व्यर्थ होगा । तुम इस संसार के प्रतिष्ठित पुरुष हो । यदि तुम कोई अत्यन्त जघन्य कर्म करोगे, तो उस जघन्य कर्म के कारण मैं तुम्हें सदा के लिए त्याग दूँगा । पुत्रो ! समय आने पर तुम्हें अपने प्राणों का भी त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए । 76-77॥
 
श्लोक 78:  गोविन्द! तुम सदैव क्षत्रिय धर्म में लगे रहने वाले माद्रीनन्दन नकुल-सहदेव से भी कहो- ‘पुत्रो! प्राणों की बाजी लगाकर भी तुम वीरता से प्राप्त सुखों को ही स्वीकार करो ॥78॥
 
श्लोक 79:  पुरुषोत्तम! क्षत्रिय जीवन जीने वाले पुरुष का मन वीरता से अर्जित धन से सदैव संतुष्ट रहता है।
 
श्लोक 80:  महाबाहो! आप पाण्डवों के पास जाइये और समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, पाण्डवपुत्र वीर अर्जुन से कहिये कि वह द्रौपदी के बताये हुए मार्ग का अनुसरण करे।
 
श्लोक 81:  श्री कृष्ण! आप तो जानते ही हैं; यदि भीमसेन और अर्जुन अत्यन्त क्रोध करें, तो वे यमराज के समान होकर देवताओं को भी मृत्यु के निकट पहुँचा सकते हैं॥81॥
 
श्लोक 82-83:  द्रौपदी का दरबार में उपस्थित होना और दु:शासन व कर्ण द्वारा उससे कहे गए कटु वचन, ये सब भीमसेन और अर्जुन का अपमान हैं। दुर्योधन ने महारथी कौरवों के सामने बुद्धिमान भीमसेन का अपमान किया है। उसे इसके परिणाम भुगतने होंगे। 82-83
 
श्लोक 84:  भीमसेन शत्रुता करने के बाद कभी शांत नहीं होते। भीमसेन का शत्रुता बहुत समय तक भी समाप्त नहीं होता, जब तक कि वे शत्रु का वध न कर दें। 84.
 
श्लोक 85-86:  राज्य की हानि दुःख का कारण नहीं है। जुए में हार जाना भी दुःख का कारण नहीं है। मेरे पुत्र वन में चले गए, इससे भी मुझे दुःख नहीं होता; परन्तु मेरी परम सुन्दरी पत्नी को केवल एक वस्त्र पहनकर सभा में जाना पड़ा और दुष्टों के कटु वचन सुनने पड़े, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है ?॥ 85-86॥
 
श्लोक 87:  मेरी सुन्दरी पुत्रवधू कृष्णा, जो सदैव क्षत्रिय धर्म में प्रेम रखती थी, उस समय रजस्वला थी। उसकी देखभाल करने पर भी, उसे वहाँ कोई रक्षक नहीं मिला। 87
 
श्लोक 88-89:  पुरुषोत्तम! मधुसूदन! जिस कुन्ती के पुत्र श्रेष्ठ बलवान बलरामजी, महारथी प्रद्युम्न और आप हैं, तथा जिसके रक्षक हैं; युद्ध में पीठ न दिखाने वाले विजयी अर्जुन और भयंकर भीमसेन जैसे पुत्र जिनके जीवित हैं, वही मैं ऐसे दुःख भोग रहा हूँ॥ 88-89॥
 
श्लोक 90:  वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! तत्पश्चात् अर्जुन के सखा भगवान श्रीकृष्ण ने पुत्रों की चिन्ता से शोक करने वाली अपनी बुआ कुन्ती को यह आश्वासन दिया ॥90॥
 
श्लोक 91:  भगवान वसुदेव बोले - "बुआ! संसार में तुम्हारे समान सौभाग्यशाली और कौन है? तुम राजा शूरसेन की पुत्री हो और राजा अजमीढ़ के कुल में ब्याही गई हो।"
 
श्लोक 92:  तू उच्च कुल की कन्या है और दूसरे उच्च कुल में ब्याही गई है; मानो कमल एक सरोवर से दूसरे सरोवर में आ गया हो। तू पहले सर्व कल्याणमयी रानी थी; तेरे पति ने सदैव तेरा विशेष आदर किया है॥92॥
 
श्लोक 93:  आप वीर पत्नी, वीर माता और सर्वगुण संपन्न हैं। महामुनि! आप जैसी समझदार स्त्री को सुख-दुःख चुपचाप सह लेना चाहिए। 93॥
 
श्लोक 94:  आपके सभी पुत्र निद्रा, तंद्रा, क्रोध, हर्ष, भूख, प्यास, शीत और उष्णता को जीतकर सदैव वीर सुख का उपभोग करते हैं ॥ 94॥
 
श्लोक 95:  आपके पुत्रों ने ग्राम्य सुखों का त्याग कर दिया है; वे सदैव वीर सुखों में ही रुचि रखते हैं। वे बड़े उत्साही और बलवान हैं; इसलिए वे थोड़े से धन से संतुष्ट नहीं हो सकते॥ 95॥
 
श्लोक 96-97:  धैर्यवान पुरुष सुखों की अंतिम अवस्था का ही आनंद लेते हैं। जो पुरुष ग्राम्य सुखों में लीन रहते हैं, वे सुखों की मध्य अवस्था का ही आनंद लेते हैं। वे धैर्यवान पुरुष अपने कर्तव्य पालन के रूप में प्राप्त होने वाले बड़े-बड़े कष्टों को भी प्रसन्नतापूर्वक सहन करते हैं और अंत में मानवीय सीमाओं से परे सुखों का आनंद लेते हैं। महापुरुष कहते हैं कि अंतिम अवस्था (सुख-दुःख से परे) की प्राप्ति ही वास्तविक सुख है और सुख-दुःख के बीच की अवस्था ही दुःख है।॥96-97॥
 
श्लोक 98:  बुआ! द्रौपद सहित पाण्डवों ने आपको नमस्कार भेजा है और बताया है कि वे सकुशल हैं॥ 98॥
 
श्लोक 99:  आप शीघ्र ही देखेंगे कि पाण्डव स्वस्थ अवस्था में आपके समक्ष उपस्थित हैं, उनकी सभी इच्छाएं पूर्ण हो चुकी हैं तथा शत्रुओं का संहार कर वे साम्राज्य की देवी के साथ संयुक्त होकर सम्पूर्ण विश्व के अधिपति के रूप में स्थापित हो चुके हैं।
 
श्लोक 100:  यह आश्वासन पाकर अपने पुत्रों से अलग लेटी हुई कुन्तीदेवी ने अज्ञानजनित मोह का प्रतिरोध करके भगवान जनार्दन से कहा ॥100॥
 
श्लोक 101:  कुन्ती बोलीं - "हे महाबाहु मधुसूदन श्रीकृष्ण! पाण्डवों के लिए जो हितकर हो, जो कार्य आप उचित समझें, वही कीजिए।" ॥101॥
 
श्लोक 102:  हे परंतप श्रीकृष्ण! आपको धर्म का परित्याग किए बिना, छल-कपट से दूर रहकर, उचित समय पर उचित कार्य करना चाहिए। मैं आपकी सत्यनिष्ठा और आपके कुल की मर्यादा की शक्ति को जानता हूँ॥ 102॥
 
श्लोक 103-104:  मैं प्रत्येक कार्य के संचालन में, मित्रों के संग्रह में, बुद्धि और पराक्रम में आपके अद्भुत प्रभाव से परिचित हूँ। हमारे कुल में आप ही धर्म हैं, आप ही सत्य हैं, आप ही महान तप हैं, आप ही रक्षक हैं और आप ही परमेश्वर हैं। सब कुछ आपमें ही प्रतिष्ठित है। आप जो कुछ भी कहते हैं, वह आपके समक्ष सदैव सत्य ही होगा।॥103-104॥
 
श्लोक d1-d2h:  हे वृष्णिनन्दन माधव, जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता! आप कौरवों, पाण्डवों तथा सम्पूर्ण जगत के आश्रय हैं। केशव! आपका प्रभाव और आपकी बुद्धि शक्ति भी आपके अनुरूप ही है।
 
श्लोक 105:  वैशम्पायन कहते हैं, 'हे जनमेजय! तत्पश्चात् बलवान गोविन्द ने कुन्तीदेवी की प्रदक्षिणा करके और उनकी अनुमति लेकर दुर्योधन के भवन की ओर प्रस्थान किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)