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mahabharat 5.9.d1-d6: उस बढ़ई ने भी अपने घर जाकर किसी से कुछ नहीं कहा। उसके बाद एक वर्ष तक किसी को पता ही नहीं चला कि इंद्र ने ऐसा काम किया है। युधिष्ठिर! वर्ष के अंत में भगवान पशुपति के प्रेत चिल्लाने लगे कि हमारे स्वामी इंद्र ब्रह्म-हत्यारे हैं। तब पक्षाघाती इंद्र ने ब्रह्महत्या से मुक्ति पाने के लिए कठिन व्रत किया। वे देवताओं और मरुभूमिवासियों के साथ तपस्या में लग गए। उन्होंने अपनी ब्रह्महत्या को समुद्र, पृथ्वी, वृक्षों और स्त्रियों में बांट दिया और उन सभी को वांछित वरदान दिया। इस प्रकार वरदाता इंद्र ने पृथ्वी, समुद्र, वनस्पतियों और स्त्रियों को वरदान देकर उस ब्रह्महत्या का निवारण किया। तत्पश्चात, शुद्ध होकर भगवान इंद्र अपने इंद्रपद पर विराजमान हुए और देवताओं, मनुष्यों तथा ऋषियों द्वारा पूजित हुए।   |   mahabharat अध्याय 5.9: इन्द्रके द्वारा त्रिशिराका वध, वृत्रासुरकी उत्पत्ति, उसके साथ इन्द्रका युद्ध तथा देवताओंकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 9: इन्द्रके द्वारा त्रिशिराका वध, वृत्रासुरकी उत्पत्ति, उसके साथ इन्द्रका युद्ध तथा देवताओंकी पराजय  »  श्लोक d1-d6
 
 
श्लोक  5.9.d1-d6 
(तक्षापि स्वगृहं गत्वा नैव शंसति कस्यचित्।
अथैनं नाभिजानन्ति वर्षमेकं तथागतम्॥
अथ संवत्सरे पूर्णे भूता: पशुपते: प्रभो।
समाक्रोशन्त मघवान् न: प्रभुर्ब्रह्महा इति॥
तत इन्द्रो व्रतं घोरमाचरत् पाकशासन:।
तपसा च स संयुक्त: सह देवैर्मरुद्‍गणै:॥
समुद्रेषु पृथिव्यां च वनस्पतिषु स्त्रीषु च।
विभज्य ब्रह्महत्यां च तान् वरैरप्ययोजयत्॥
वरदस्तु वरं दत्त्वा पृथिव्यै सागराय च।
वनस्पतिभ्य: स्त्रीभ्यश्च ब्रह्महत्यां नुनोद ताम्॥
ततस्तु शुद्धो भगवान‍् देवैर्लोकैश्च पूजित:।
इन्द्रस्थानमुपातिष्ठत् पूज्यमानो महर्षिभि:॥ )
 
 
अनुवाद
उस बढ़ई ने भी अपने घर जाकर किसी से कुछ नहीं कहा। उसके बाद एक वर्ष तक किसी को पता ही नहीं चला कि इंद्र ने ऐसा काम किया है। युधिष्ठिर! वर्ष के अंत में भगवान पशुपति के प्रेत चिल्लाने लगे कि हमारे स्वामी इंद्र ब्रह्म-हत्यारे हैं। तब पक्षाघाती इंद्र ने ब्रह्महत्या से मुक्ति पाने के लिए कठिन व्रत किया। वे देवताओं और मरुभूमिवासियों के साथ तपस्या में लग गए। उन्होंने अपनी ब्रह्महत्या को समुद्र, पृथ्वी, वृक्षों और स्त्रियों में बांट दिया और उन सभी को वांछित वरदान दिया। इस प्रकार वरदाता इंद्र ने पृथ्वी, समुद्र, वनस्पतियों और स्त्रियों को वरदान देकर उस ब्रह्महत्या का निवारण किया। तत्पश्चात, शुद्ध होकर भगवान इंद्र अपने इंद्रपद पर विराजमान हुए और देवताओं, मनुष्यों तथा ऋषियों द्वारा पूजित हुए।
 
That carpenter also did not say anything to anyone when he went to his home. After that, no one came to know for a year that Indra had done such a thing. Yudhisthira! At the end of the year, the ghosts of Lord Pashupati started shouting that our lord Indra is a Brahma-killer. Then Pakshasan Indra observed a difficult fast to get freedom from Brahmahatya. He engaged in penance along with the gods and the desert people. He distributed his Brahmahatya among the sea, earth, trees and women and gave the desired boon to all of them. In this way, Indra, the giver of blessings, averted that Brahmahatya by giving boons to the earth, sea, vegetation and women. Thereafter, after getting purified, Lord Indra sat on his Indrapad and was worshiped by gods, humans and sages.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)