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mahabharat 5.9.56-57: हे भरतश्रेष्ठ! क्रोध से भरे हुए उन दोनों वीरों का वह भयंकर युद्ध बहुत समय तक चलता रहा। जब त्वष्टा के तेज और पराक्रम से युक्त वृत्रासुर युद्ध में और भी अधिक शक्तिशाली हो गया, तब इन्द्र युद्ध से विमुख हो गया। इन्द्र के विमुख हो जाने पर समस्त देवता अत्यन्त दुःखी हुए।   |   mahabharat अध्याय 5.9: इन्द्रके द्वारा त्रिशिराका वध, वृत्रासुरकी उत्पत्ति, उसके साथ इन्द्रका युद्ध तथा देवताओंकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 9: इन्द्रके द्वारा त्रिशिराका वध, वृत्रासुरकी उत्पत्ति, उसके साथ इन्द्रका युद्ध तथा देवताओंकी पराजय  »  श्लोक 56-57
 
 
श्लोक  5.9.56-57 
संरब्धयोस्तदा घोरं सुचिरं भरतर्षभ।
यदा व्यवर्धत रणे वृत्रो बलसमन्वित:॥ ५६॥
त्वष्टुस्तेजोबलाविद्धस्तदा शक्रो न्यवर्तत।
निवृत्ते च तदा देवा विषादमगमन् परम्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! क्रोध से भरे हुए उन दोनों वीरों का वह भयंकर युद्ध बहुत समय तक चलता रहा। जब त्वष्टा के तेज और पराक्रम से युक्त वृत्रासुर युद्ध में और भी अधिक शक्तिशाली हो गया, तब इन्द्र युद्ध से विमुख हो गया। इन्द्र के विमुख हो जाने पर समस्त देवता अत्यन्त दुःखी हुए।
 
O best of the Bharatas! That terrible battle between those two heroes, filled with anger, continued for a long time. When Vritrasura, filled with the brilliance and power of Tvashta, became more powerful in the battle, then Indra turned away from the battle. All the gods were very sad when Indra turned away.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)