तास्तु यत्नं परं कृत्वा पुन: शक्रमुपस्थिता:॥ १७॥
कृताञ्जलिपुटा: सर्वा देवराजमथाब्रुवन्।
न स शक्य: सुदुर्धर्षो धैर्याच्चालयितुं प्रभो॥ १८॥
यत् ते कार्यं महाभाग क्रियतां तदनन्तरम्।
अनुवाद
वे समस्त अप्सराएँ (त्रिशिरा को विचलित करने का) पूर्ण प्रयत्न करके पुनः देवराज इन्द्र की सेवा में उपस्थित हुईं और हाथ जोड़कर बोलीं, 'प्रभु! वह त्रिशिरा बड़ा कठोर तपस्वी है, उसे धैर्य से विचलित नहीं किया जा सकता। हे महामुने! अब आपको जो करना हो, कीजिए।'॥17-18 1/2॥
All those Apsaras, after making full efforts (to disturb Trishira), again appeared in the service of Devraj Indra and with folded hands said, 'Prabhu! That Trishira is a very tough ascetic, he cannot be disturbed with patience. O great one! Now do whatever you have to do.'॥ 17-18 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥