Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 5.88.6: प्रभु! फिर भी मेरा विचार है कि इस समय उन्हें कुछ भी नहीं देना चाहिए; क्योंकि यही कार्य करने की मान्य पद्धति है। जब झगड़ा शुरू हो गया हो, तो केवल अतिथि सत्कार करके प्रेम दिखाने से उसे शांत नहीं किया जा सकता।॥6॥   |   mahabharat अध्याय 5.88: दुर्योधनका श्रीकृष्णके विषयमें अपने विचार कहना एवं उसकी कुमन्त्रणासे कुपित हो भीष्मजीका सभासे उठ जाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 88: दुर्योधनका श्रीकृष्णके विषयमें अपने विचार कहना एवं उसकी कुमन्त्रणासे कुपित हो भीष्मजीका सभासे उठ जाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.88.6 
न तु तस्मै प्रदेयं स्यात् तथा कार्यगति: प्रभो।
विग्रह: समुपारब्धो न हि शाम्यत्यविग्रहात्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! फिर भी मेरा विचार है कि इस समय उन्हें कुछ भी नहीं देना चाहिए; क्योंकि यही कार्य करने की मान्य पद्धति है। जब झगड़ा शुरू हो गया हो, तो केवल अतिथि सत्कार करके प्रेम दिखाने से उसे शांत नहीं किया जा सकता।॥6॥
 
Prabhu! However, I am of the opinion that nothing should be given to them at this time; because this is the accepted way of working. When the quarrel has started, it cannot be pacified merely by showing love by hosting guests. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)