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mahabharat 5.88.4: प्रजानाथ! जहाँ कहीं क्षत्रिय का अपमान हो, वहाँ विवेकशील क्षत्रिय को ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए। यह मेरा दृढ़ मत है।॥4॥   |   mahabharat अध्याय 5.88: दुर्योधनका श्रीकृष्णके विषयमें अपने विचार कहना एवं उसकी कुमन्त्रणासे कुपित हो भीष्मजीका सभासे उठ जाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 88: दुर्योधनका श्रीकृष्णके विषयमें अपने विचार कहना एवं उसकी कुमन्त्रणासे कुपित हो भीष्मजीका सभासे उठ जाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.88.4 
अवमानश्च यत्र स्यात् क्षत्रियस्य विशाम्पते।
न तत् कुर्याद् बुध: कार्यमिति मे निश्चिता मति:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
प्रजानाथ! जहाँ कहीं क्षत्रिय का अपमान हो, वहाँ विवेकशील क्षत्रिय को ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए। यह मेरा दृढ़ मत है।॥4॥
 
Prajanath! Wherever a Kshatriya is insulted, a sensible Kshatriya should not do such an act. This is my firm opinion. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)