श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 87: विदुरका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेके लिये समझाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.87.15 
आशंसमान: कल्याणं कुरूनभ्येति केशव:।
येनैव राजन्नर्थेन तदेवास्मा उपाकुरु॥ १५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! दोनों पक्षों का कल्याण चाहने वाले भगवान केशव जिस उद्देश्य से इस कुरु देश में आ रहे हैं, वही उन्हें दान में दीजिए॥15॥
 
Maharaj! Desiring the welfare of both the parties, for which purpose Lord Keshav is coming to this Kuru country, give him that as a gift. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)