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mahabharat 5.87.12: मैं श्रीकृष्ण की महानता जानता हूँ। मैं अर्जुन की श्रीकृष्ण के प्रति दृढ़ भक्ति को भी जानता हूँ। अतः मुझे निश्चय है कि श्रीकृष्ण अपने प्राणों के समान प्रिय मित्र अर्जुन का कभी परित्याग नहीं कर सकते॥ 12॥   |   mahabharat अध्याय 5.87: विदुरका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेके लिये समझाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 87: विदुरका धृतराष्ट्रको श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेके लिये समझाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.87.12 
वेद कृष्णस्य माहात्म्यं वेदास्य दृढभक्तिताम्।
अत्याज्यमस्य जानामि प्राणैस्तुल्यं धनंजयम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
मैं श्रीकृष्ण की महानता जानता हूँ। मैं अर्जुन की श्रीकृष्ण के प्रति दृढ़ भक्ति को भी जानता हूँ। अतः मुझे निश्चय है कि श्रीकृष्ण अपने प्राणों के समान प्रिय मित्र अर्जुन का कभी परित्याग नहीं कर सकते॥ 12॥
 
I know the greatness of Shri Krishna. I am also aware of Arjun's strong devotion towards Shri Krishna. Hence, I know for sure that Shri Krishna can never abandon Arjun, his friend who is as dear as his life.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)