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mahabharat 5.86.4: जैसे आदित्य, वसु और रुद्रगण बृहस्पति की बुद्धि का आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार वृष्णि और अंधक वंश के लोग श्रीकृष्ण की बुद्धि पर आश्रित होकर सुखी रहते हैं॥4॥   |   mahabharat अध्याय 5.86: धृतराष्ट्रका भगवान‍् श्रीकृष्णकी अगवानी करके उन्हें भेंट देने एवं दु:शासनके महलमें ठहरानेका विचार प्रकट करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 86: धृतराष्ट्रका भगवान‍् श्रीकृष्णकी अगवानी करके उन्हें भेंट देने एवं दु:शासनके महलमें ठहरानेका विचार प्रकट करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.86.4 
वृष्ण्यन्धका: सुमनसो यस्य प्रज्ञामुपासते।
आदित्या वसवो रुद्रा यथा बुद्धिं बृहस्पते:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जैसे आदित्य, वसु और रुद्रगण बृहस्पति की बुद्धि का आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार वृष्णि और अंधक वंश के लोग श्रीकृष्ण की बुद्धि पर आश्रित होकर सुखी रहते हैं॥4॥
 
Just as Aditya, Vasu and Rudragans take shelter of the wisdom of Jupiter, in the same way the people of Vrishni and Andhaka dynasty remain happy and dependent on the wisdom of Shri Krishna. 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)