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mahabharat 5.86.11: मेरे पास एक अत्यंत उज्ज्वल और शुद्ध रत्न है जो दिन-रात चमकता रहता है। मैं इसे भी श्री कृष्ण को दूँगा क्योंकि वे ही इसके योग्य हैं।   |   mahabharat अध्याय 5.86: धृतराष्ट्रका भगवान‍् श्रीकृष्णकी अगवानी करके उन्हें भेंट देने एवं दु:शासनके महलमें ठहरानेका विचार प्रकट करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.86.11 
दिवा रात्रौ च भात्येष सुतेजा विमलो मणि:।
तमप्यस्मै प्रदास्यामि तमर्हति हि केशव:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
मेरे पास एक अत्यंत उज्ज्वल और शुद्ध रत्न है जो दिन-रात चमकता रहता है। मैं इसे भी श्री कृष्ण को दूँगा क्योंकि वे ही इसके योग्य हैं।
 
I have a very radiant and pure gem which shines day and night. I will give this also to Shri Krishna because he is the only one who is worthy of it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)