श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 86: धृतराष्ट्रका भगवान‍् श्रीकृष्णकी अगवानी करके उन्हें भेंट देने एवं दु:शासनके महलमें ठहरानेका विचार प्रकट करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  5.86.10 
अजिनानां सहस्राणि चीनदेशोद्भवानि च।
तान्यप्यस्मै प्रदास्यामि यावदर्हति केशव:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
मेरे कोष में चीन में उत्पन्न हजारों मृगचर्म सुरक्षित हैं; उनमें से जितने श्रीकृष्ण लेना चाहेंगे, मैं उन्हें अर्पित कर दूँगा॥10॥
 
Thousands of deerskins produced in China are safely stored in my treasury; as many of them as Shri Krishna wishes to take, I shall offer them all to him.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)