श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 85: दुर्योधनका धृतराष्ट्र आदिकी अनुमतिसे श्रीकृष्णके स्वागत-सत्कारके लिये मार्गमें विश्रामस्थान बनवाना  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  5.85.3-4 
अद्‍भुतं महदाश्चर्यं श्रूयते कुरुनन्दन।
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च कथयन्ति गृहे गृहे॥ ३॥
सत्कृत्याचक्षते चान्ये तथैवान्ये समागता:।
पृथग्वादाश्च वर्तन्ते चत्वरेषु सभासु च॥ ४॥
 
 
अनुवाद
कुरु नंदन! एक विचित्र और अत्यंत आश्चर्यजनक बात सुनने को मिल रही है। घर-घर में स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े, सभी इसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं। यहाँ के निवासी और बाहर से आए लोग भी आदरपूर्वक यही बात कहते हैं। चौराहों और सभाओं में भी यही चर्चा होती रहती है।'
 
‘Kuru Nandan! A strange and extremely surprising thing is being heard. In every house, women, children and old people talk about this. Those who are residents here and those who have come from outside also say the same thing respectfully. The same discussion goes on at crossroads and in meetings also. 3-4.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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