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श्लोक 5.85.18  |
ता: सभा: केशव: सर्वा रत्नानि विविधानि च।
असमीक्ष्यैव दाशार्ह उपायात् कुरुसद्म तत्॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| परंतु यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण ने उन विश्रामस्थानों और नाना प्रकार के रत्नों की ओर देखा तक नहीं और कौरवों के निवासस्थान हस्तिनापुर की ओर बढ़ते रहे॥18॥ |
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| But Yadukultilak Shri Krishna did not even look towards those resting places and various types of gems and kept moving towards Hastinapur, the residence of Kauravas. 18॥ |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मार्गे सभानिर्माणे पञ्चाशीतितमोऽध्याय:॥ ८५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मार्गमें विश्रामस्थलनिर्माणविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८५॥
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