श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 84: मार्गके शुभाशुभ शकुनोंका वर्णन तथा मार्गमें लोगोंद्वारा सत्कार पाते हुए श्रीकृष्णका वृकस्थल पहुँचकर वहाँ विश्राम करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.84.3 
जनमेजय उवाच
कथं प्रयातो दाशार्हो महात्मा मधुसूदन:।
कानि वा व्रजतस्तस्य निमित्तानि महौजस:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा, "दशर्कुलतिलक कुल के महापुरुष मधुसूदन ने किस प्रकार यात्रा की? जब महाबली कृष्ण जा रहे थे, तब कौन-कौन से शुभ-अशुभ शकुन हुए?"
 
Janamejaya asked, "How did the great soul Madhusudana of the Dasarhakulatilaka family travel? What good and bad omens appeared when the mighty Krishna was going?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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