Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.83.6-7: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात जब रात्रि का अंधकार दूर हो गया और सूर्यदेव निर्मल आकाश में उदित हुए, तो उनकी कोमल किरणें सर्वत्र फैल गईं। जब कार्तिक मास के रेवती नक्षत्र में 'मैत्रे' नामक शुभ मुहूर्त प्रकट हुआ, तब पुण्यात्मा पुरुषों में श्रेष्ठ एवं योग्यतम श्रीकृष्ण ने अपनी यात्रा प्रारंभ की। उन दिनों शरद ऋतु समाप्त होकर शीत ऋतु का प्रारंभ हो रहा था। सर्वत्र फसलें प्रचुर मात्रा में उग रही थीं। | mahabharat अध्याय 5.83: श्रीकृष्णका हस्तिनापुरको प्रस्थान, युधिष्ठिरका माता कुन्ती एवं कौरवोंके लिये संदेश तथा श्रीकृष्णको मार्गमें दिव्य महर्षियोंका दर्शन । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात जब रात्रि का अंधकार दूर हो गया और सूर्यदेव निर्मल आकाश में उदित हुए, तो उनकी कोमल किरणें सर्वत्र फैल गईं। जब कार्तिक मास के रेवती नक्षत्र में 'मैत्रे' नामक शुभ मुहूर्त प्रकट हुआ, तब पुण्यात्मा पुरुषों में श्रेष्ठ एवं योग्यतम श्रीकृष्ण ने अपनी यात्रा प्रारंभ की। उन दिनों शरद ऋतु समाप्त होकर शीत ऋतु का प्रारंभ हो रहा था। सर्वत्र फसलें प्रचुर मात्रा में उग रही थीं।
Vaishampayana says - Janamejaya! Thereafter when the darkness of the night was dispelled and the Sun rose in the clear sky, its soft rays spread everywhere. When the auspicious moment called 'Maitre' appeared in the Revati constellation of the month of Kartik, Shri Krishna, the best and most capable of the virtuous men, started his journey. In those days, the autumn season was ending and winter was beginning. Everywhere, the crops were growing in abundance.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥