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mahabharat 5.83.54: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! पाण्डुनन्दन अर्जुन के ऐसा कहने पर पाण्डव भीमसेन अत्यन्त प्रसन्न हुए । वे क्रोध के कारण बार-बार काँपने लगे ॥54॥   |   mahabharat अध्याय 5.83: श्रीकृष्णका हस्तिनापुरको प्रस्थान, युधिष्ठिरका माता कुन्ती एवं कौरवोंके लिये संदेश तथा श्रीकृष्णको मार्गमें दिव्य महर्षियोंका दर्शन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 83: श्रीकृष्णका हस्तिनापुरको प्रस्थान, युधिष्ठिरका माता कुन्ती एवं कौरवोंके लिये संदेश तथा श्रीकृष्णको मार्गमें दिव्य महर्षियोंका दर्शन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  5.83.54 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते पाण्डवेन समहृष्यद् वृकोदर:।
मुहुर्मुहु: क्रोधवशात् प्रावेपत च पाण्डव:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! पाण्डुनन्दन अर्जुन के ऐसा कहने पर पाण्डव भीमसेन अत्यन्त प्रसन्न हुए । वे क्रोध के कारण बार-बार काँपने लगे ॥54॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Pandava Bhimsen was very happy when Pandunandan Arjun said this. He started shaking again and again due to anger. 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)