श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 82: द्रौपदीका श्रीकृष्णसे अपना दु:ख सुनाना और श्रीकृष्णका उसे आश्वासन देना  »  श्लोक 4-6
 
 
श्लोक  5.82.4-6 
विदितं ते महाबाहो धर्मज्ञ मधुसूदन।
यथा निकृतिमास्थाय भ्रंशिता: पाण्डवा: सुखात्॥ ४॥
धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण सामात्येन जनार्दन।
यथा च संजयो राज्ञा मन्त्रं रहसि श्रावित:॥ ५॥
युधिष्ठिरस्य दाशार्ह तच्चापि विदितं तव।
यथोक्त: संजयश्चैव तच्च सर्वं श्रुतं त्वया॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे धर्म के ज्ञाता महाबाहु मधुसूदन! आप तो जानते ही हैं कि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन ने किस प्रकार अपने मन्त्रियों के साथ छल करके पाण्डवों को सुख से वंचित कर दिया था। दशार्हनपुत्र! आप उस मन्त्र (अपने विचार) को भी जानते हैं, जिसे राजा धृतराष्ट्र ने संजय को युधिष्ठिर को एकान्त में सुनाने के लिए भेजा था। आपने वे बातें भी सुनी हैं, जो धर्मराज ने संजय से कही थीं॥ 4-6॥
 
Mahabahu Madhusudan, the knower of Dharma! You already know how Duryodhan, the son of Dhritarashtra, along with his ministers, resorted to deceit and deprived the Pandavas of happiness. Son of Dasharhan! You also know the mantra (his thoughts) which King Dhritarashtra had sent Sanjaya here to tell Yudhishthira in private. You have also heard the things that Dharmaraja had said to Sanjaya.॥ 4-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)