श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 81: युद्धके लिये सहदेव तथा सात्यकिकी सम्मति और समस्त योद्धाओंका समर्थन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.81.3 
कथं नु दृष्ट्वा पाञ्चालीं तथा कृष्ण सभागताम्।
अवधेन प्रशाम्येत मम मन्यु: सुयोधने॥ ३॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! पांचाल राजकुमारी द्रौपदी को इस प्रकार सभा में लाकर खड़ी देखकर दुर्योधन के प्रति मेरा जो क्रोध बढ़ गया है, वह उसे मारे बिना कैसे शांत हो सकता है?॥3॥
 
Sri Krishna! How can my anger against Duryodhana, which has increased after seeing Panchala princess Draupadi brought into the assembly in such a state, be appeased without killing him?॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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